बिना तैयारी के पेपर Giving Exam without Preparation
पूना ने कहा : कुशी का DSSSB MTS का फॉर्म भर दे
मैने बोला : कोई फायदा नहीं है
पूना : (व्हाट्सएप एसएमएस में) क्या पता तुक्का लग जाए
मेरा कवि मन जागा और ये आया मेरे मन में एक हल्की मुस्कान के साथ:
तुक्का लगाने के लिए
पहले वाइ टाइप की एक लकड़ी लेनी पड़ती है
फिर उस पर प्लास्टिक बांधना होता है,
जोकि खराब टायर की टीप का बना होता है
या फिर छल्ला या रबड़ का
फिर एक या तो रोड़ी लेनी पड़ती है
यानि कि बजरी जो कि मजबूत हो
या फिर छाज की एक शली और उसके आगे तारकोल लगाकर फिर उसमें एक सूल लगाते हैं
वह हल्के वजन का तीर बन जाता है
फिर उसे तुक्के पर चढ़ा कर चलाते हैं
परंतु इनमें से उसके पास तो एक भी चीज का अनुभव नहीं है शायद (मैं उनको कमतर नहीं आंक रहा इसीलिए शायद शब्द प्रयोग हुआ है)
तो फिर तुक्का लग कैसे जाएगा
कहने का मतलब है यदि खुले में
शेर का शिकार करना है तो जंगल में तो जाना ही होगा
और उसे ना तो जंगल का पता है और ना शेर का की कहां मिलेगा
तो वही बात हो गई न जैसे कि मेरी रागनी में
"बिना ज्ञान का शिकारी"
आपकी बात में बहुत गहराई है और आपने 'तुक्का' (गुलेल जैसा एक पारंपरिक देशी उपकरण) बनाने की प्रक्रिया को इतनी बारीकी से समझाया है, जैसे कोई अनुभवी शिल्पकार समझाता हो।
रामू कवि किसान जी की रचनाओं में जिस तरह ग्रामीण संस्कृति की खुशबू आती है, ठीक वैसे ही आपने एक छोटे से उपकरण के जरिए जीवन का एक बड़ा फलसफा बयान कर दिया है। आपका तर्क बिल्कुल सटीक है: बिना तैयारी, बिना सामग्री और बिना अनुभव के 'तुक्का' नहीं लग सकता।
यहाँ आपके तर्क के कुछ मुख्य बिंदु और उनकी गहराई को समझते हैं:
1. साधना और तैयारी (Preparation)
आपने बताया कि एक तुक्का बनाने के लिए:
* V-टाइप लकड़ी: जो आधार है।
* पुराने टायर की ट्यूब (टीप): जो लचीलापन और शक्ति देती है।
* कंकड़ या तारकोल वाली शली: जो लक्ष्य को भेदने का माध्यम है।
सीख: यदि किसी व्यक्ति के पास ये बुनियादी 'औजार' (कौशल या संसाधन) ही नहीं हैं, तो वह केवल हवा में हाथ मार रहा है। बिना ठोस आधार के सफलता की उम्मीद करना व्यर्थ है।
2. अनुभव का अभाव (Lack of Experience)
आपने सही कहा कि उसके पास एक भी चीज का अनुभव नहीं है। शिकार या सफलता 'संयोग' (Fluke) से एक बार मिल सकती है, लेकिन बार-बार नहीं। अनुभव वह 'तारकोल' है जो लक्ष्य और साधन को आपस में जोड़ता है।
3. शेर और जंगल का उदाहरण
"शेर का शिकार करना है तो जंगल में जाना ही होगा"—यह कहावत यहाँ पूरी तरह फिट बैठती है।
* जंगल: वह कार्यक्षेत्र या मेहनत का मैदान है।
* शेर: वह बड़ा लक्ष्य है जिसे हासिल करना है।
जो व्यक्ति न मैदान (जंगल) को जानता है और न अपने लक्ष्य (शेर) के स्वभाव को, वह तो सिर्फ अंधेरे में तीर चला रहा है। उसे यह भी नहीं पता कि खतरा कहाँ है और अवसर कहाँ।
निष्कर्ष:
जिसे आप 'तुक्का' कह रहे हैं, वह दरअसल कौशल और संकल्प का मेल है। बिना जानकारी के कोई भी प्रयास वैसा ही है जैसे बिना रबड़ के लकड़ी को खींचना—श्रम तो पूरा लगेगा, लेकिन निशाना कभी नहीं लगेगा।
आपकी बात के मर्म को समझते हुए, रामू कवि किसान जी की उस ठेठ हरियाणवी शैली में एक कविता (रागनी के अंदाज़ में) तैयार की है। इसमें वही तुक्का, वही जंगल और वही अनुभव की कमी का ज़िक्र है:
बिना ज्ञान का तुक्का
बिना नीम की नींव धरे, कदे महल ना बणता देख्या,
बिना तजुर्बे हाथ में शिकारी, कदे शेर ना हणता देख्या।
वाइ (V) की लकड़ी हाथ ना आई, ट्यूब का टीप कड़ै तै लावेगा,
ना शली हाथ, ना तारकोल, तू तुक्का क्यूकर खाक चलावेगा?
गाँठ लगानी आती कोन्या, रबड़ कड़ै तै ताणेगा,
बिना हाथ-पैर की बातों पै, बोल कौण तनै जाणेगा?
जंगल का तनै पता कोन्या, ना शेर की तनै सुध-बुध है,
खाल ओढ़ के गीदड़ की, सोचे शिकारी शुद्ध है?
तुक्का लाणा खेल कोन्या, इसमें भी कड़ा अभ्यास चहिये,
मंजिल उसी नै मिल्या करै, जिसका इरादा खास चहिये।
कवि रामू की गैल समझ ले, यो जीवन का एक सार है,
बिना तैयारी मैदान में उतरणा, बस अपणी ही हार है।
इसे और भी गहरी रागनी की लय और रामू कवि किसान जी की उस खास हरियाणवी शैली में ढालते हैं, जिसमें 'मजाक' भी है और 'मर्म' भी।
इस बार इसे "बिना ज्ञान का शिकारी" शीर्षक के साथ, थोड़ा और देसी अंदाज़ में सजाया है:
रागनी: बिना ज्ञान का शिकारी
(टेक)
बातां का तू धणी बणै, पर काम की एक भी बात नहीं,
हाथ में तेरे तुक्का कोन्या, और शेर मारण की औकात नहीं!
(1)
वाइ (V) की लकड़ी छीलणी आवै ना, तू रबड़ कड़े तै ल्यावेगा?
पुराणे टायर की टीप बिना, तू कड़ै क्या पै जोर लगावेगा?
बिना तारकोल की शली तेरी, हवा में गोते खावेगी,
बिना सूल का तुक्का रे भाई, तेरी ए बेइज्जती करवावेगी!
(2)
जंगल की तनै बाट पता ना, ना शेर की तनै गुफा बेरा,
अंधेरे में हाथ मारे जा सै, तनै ना अपनी सुध का बेरा।
शिकारी बणना खेल कोन्या, इसमें हड्डियाँ तपानी पड़ै सै,
शेर के पंजे देख के भाई, रूह भी थथकानी पड़ै सै!
(3)
अनुभव की कोन्या गाँठ पल्ले, तू उस्ताद बणण की ठाणै सै,
बिना बीज के खेत में भाई, तू फसल काटणी जाणै सै।
रामू कवि किसान कहै, यो ज्ञान सडक पै ना मिलता,
बिना खाद और पानी के, कदे बाग में फूल ना खिलता!

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